रामचरितमानस की शुरुआत और ‘9’ के अंक का वो रहस्य, जो बहुत कम लोग जानते हैं!

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श्री सीताराम-वंदना 
दोहा:
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।
सरल अर्थ:
मैं श्री सीता-राम जी के चरणों की वंदना करता हूँ। वे दोनों कहने में तो अलग-अलग हैं, लेकिन असल में एक ही हैं—जैसे वाणी और उसका अर्थ अलग नहीं हो सकते, और पानी और उसकी लहरें अलग नहीं हो सकतीं। ऐसे करुणामयी सीताराम जी को ‘खिन्न’ यानी दुखी और असहाय लोग सबसे ज्यादा प्यारे लगते हैं।

मुख्य बातें (आसान भाषा में):
1. गोस्वामी तुलसीदास जी और ‘9’ का अंक (पूर्णता का प्रतीक)
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की शुरुआत में सीताराम जी की वंदना करने के बाद, भगवान के ‘नाम’ की महिमा बताने के लिए 9 दोहे और 72 चौपाइयां लिखी हैं। तुलसीदास जी को 9 का अंक बहुत पसंद है क्योंकि यह पूर्ण (Complete) अंक है। गणित में 9 को किसी भी संख्या से गुणा (Multiply) करें, तो उसके अंकों को जोड़ने पर हमेशा 9 ही आता है (जैसे: 9 × 9 = 81, और 8 + 1 = 9). इसलिए जब भी तुलसीदास जी को किसी की सबसे बड़ी महिमा गानी होती है, तो वे 9 तरह के उदाहरण देते हैं।
2. रामचरितमानस की शुरुआत का अद्भुत संयोग
तुलसीदास जी ने लिखा है कि विक्रम संवत 1631 में, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि (रामनावमी) और मंगलवार के दिन अयोध्या में उन्होंने यह ग्रंथ लिखना शुरू किया।
  • खास बात: त्रेतायुग में जिस शुभ मुहूर्त, ग्रह-नक्षत्रों के संयोग में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, ठीक वैसा ही दुर्लभ और पवित्र संयोग संवत 1631 में बना। तुलसीदास जी ने इस खास और पवित्र दिन का लंबे समय तक इंतजार किया और इसी शुभ घड़ी में रामचरितमानस लिखना शुरू किया।
3. दुखों को हरने वाले सीताराम
इस संसार का नियम है कि दुखी या परेशान इंसान से लोग दूर भागते हैं। लेकिन भगवान सीताराम जी का स्वभाव बिल्कुल उल्टा है। जो इंसान अंदर से दुखी, निराश या असहाय (‘खिन्न’) है, वह भगवान को सबसे ज्यादा प्यारा होता है। वे उस पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं।
4. सीता और राम की अटूट एकता (अभिन्नता)
सीता और राम दो नहीं, बल्कि एक ही हैं। इसे समझाने के लिए दो सुंदर उदाहरण दिए गए हैं:
  • वाणी और अर्थ: हम जो बोलते हैं (वाणी), उसका कोई न कोई मतलब (अर्थ) जरूर होता है। दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।
  • पानी और लहर: नदी या समुद्र में जो लहर उठती है, वह पानी ही तो है। पानी के बिना लहर नहीं और लहर के बिना पानी नहीं।
5. शब्दों का सुंदर तालमेल (प्रेम की पराकाष्ठा)
तुलसीदास जी ने इन उदाहरणों को बहुत समझदारी से पिरोया है। पहले उन्होंने ‘वाणी’ (स्त्रीलिंग) और ‘अर्थ’ (पुल्लिंग) कहा, जो ‘सीता-राम’ को दर्शाता है। फिर उन्होंने उलटकर ‘जल’ (पुल्लिंग) और ‘लहर’ (स्त्रीलिंग) कहा, जो ‘राम-सीता’ को दर्शाता है।
आमतौर पर हम ‘सीताराम’ कहते हैं, ‘रामसीता’ नहीं। लेकिन तुलसीदास जी समझाते हैं कि जब भगवान के प्रति प्रेम बहुत गहरा हो जाता है, तब भक्त के मन से यह भेद मिट जाता है कि किसका नाम पहले लें और किसका बाद में। उनके लिए दोनों एक रूप हो जाते हैं। जैसे आगे चलकर चित्रकूट जाते समय श्री भरत जी के प्रेम में भी यही भाव दिखता है।

 

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