संक्रमित विचार
अकबर ने एक बार बीरबल से पूछा किहमारे राजय के लोगों की सोच कैसी है ? बीरबल ने कहा सबकी सोच एक सी है । अकबर ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है ? हमने तो सुना कि मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्न…
महावीर का चौथा बंदर ।
हमारी संस्कृति में हमें बताया गया कि अपने मन को यदि हमने थोड़ा साध लिया तो अपने जीवन में सब चीजें सहजता से प्राप्त होती हैं और यदि हमने उसे नहीं साधा तो हमारा जीवन यूँ …
भौतिक सोच यानी पदार्थवादी चिंतन।
ये मन के गिरते चढ़ते आयाम हैं । मन गिरे तो एक दम गिरता है और मन चढ़े तो एक दम चढ़ता है । कब गिर जाये कब चढ़ जाये इसका कोई भरोसा नहीं । ये है मन की दशा । इसलिए…
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन विश्राम ।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ।।
( सुंदरकांड , दो. 46)
राम राम बंधुओं, रावण द्वारा अपमानित होने पर विभीषण राम जी के पास…
विचारों से बनता संसार।
हमारा संपूर्ण जीवन हमारे विचारों के द्वारा नियंत्रित है । हमारे जैसे विचार होते हैं / हमारी जैसी सोच होती है / हमारी जैसी चिन्तनधारा होती है , वैसी हमारी प्रवृत्ति हो…
मन की दिशा हमारे हाथों में।
सन्त कहते हैं कि हमारी मनोवृत्ति के यही दो पक्ष हैं । जैसे माह में दो लक्ष्य जीवन का | पक्ष होते हैं शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष । शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कलायें दि…
जैसे नाम वैसी मनोवृत्ति।
इस धरती पर वे लोग जिन्हें महापुरुष के पूजते हैं । चाहे श्री राम हुये , कृष्ण हुये , महावीर हुये । हम उन्हें सन्त , महात्मा के रूप में पूजते हैं और वे भी लोग जिन्हें …
अंदर भरा सरोवर का रस।
हमारे जीवन में माधुर्य हो । माधुर्य सबको प्रिय है , मधुरता सबको अच्छी लगती है । कटुता किसी को प्रिय नहीं होती । आपके मुंह में जब कोई मधुर चीज जाती है तो मन प्रफुल्लित हो…
धर्म जोड़ता मन वीणा के टूटे तारों को।
दीपावली का समय नजदीक था , एक व्यक्ति अपने घर की सफाई में लगा हुआ था । अचनाक उसकी दृष्टि एक ऐसी वस्तु पर पड़ी , जिसके विषय में वह कुछ खास नहीं जानता था ।
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तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीं ।।
सकल सुकृत कर बड़ फल एहू । राम सीय पद सहज सनेहू ।।
( अयोध्याकाण्ड 74/2)
राम राम बंधुओं, राम जी से वन साथ चलने की आज्ञा मिलने …