अपमान अमृत और बड़ाई विष है।
✍️ अपमान अमृत और बड़ाई विष: संसार की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई
🌟 बड़ाई का बाहरी आकर्षण और इसका भ्रमजाल
1. प्रशंसा की चकाचौंध
2. हर पल भ्रमित करता मायाजाल
🎭 सांसारिक बड़ाई के पीछे का कड़वा सच
- स्वार्थ सिद्धि का साधन: लोग अपने मन में द्वेष, ईर्ष्या और लोभ रखते हुए भी अपना काम निकालने के लिए मुँह पर झूठी बड़ाई करते हैं।
- पीठ पीछे उपहास: चालाक लोग दूसरों की प्रशंसा करके अपना उल्लू सीधा करते हैं, और काम निकल जाने के बाद उसी व्यक्ति को ‘मूर्ख’ कहकर उसका उपहास उड़ाते हैं।
- शत्रुओं का हथियार: हमारे घोर शत्रु भी कई बार हमें भ्रमित करने के लिए बड़ाई का सहारा लेते हैं। वे प्रशंसा का ऐसा जाल फैलाते हैं जिसमें फँसकर व्यक्ति खुद को बर्बाद कर बैठता है।
⚠️ बड़ाई का नुकसान: प्रशंसा की लालसा रखने वाला व्यक्ति बाहरी दुनिया में इतना भटक जाता है कि वह अपने परिवार, पत्नी, बच्चों और माता-पिता के प्रति अपने वास्तविक कर्तव्यों (धर्म) को भी भूल जाता है। यहाँ तक कि वह अपनी ‘आत्मा’ के सुधार को भी दांव पर लगा देता है।
🍯 अपमान ‘अमृत’ क्यों है?
⚡ अपमान के चमत्कारी लाभ:
- अन्तर्मुखता का विकास: अपमान हमें बाहरी दुनिया के भ्रमजाल से निकालकर हमारे भीतर (अंदर की ओर) झांकने के लिए मजबूर करता है।
- गुण-दोष का सटीक आकलन: जब हमारा अपमान होता है, तब हमें अपने गुण और दोषों की सही समीक्षा करने का अवसर मिलता है।
- आत्मविकास का मार्ग: अपमान से व्यक्ति आत्म-केन्द्रित होकर गंभीरता से सोचता है। यह आत्मा के परिष्कार (शुद्धिकरण) और संस्कार का मार्ग प्रशस्त करता है, जो कि सर्वोपरि है।
⚖️ आत्मप्रशंसा भी एक विष है
🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य संदेश
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
💡 निष्कर्ष (Conclusion)
Mahabharat Ke Patron Ka Adhyatmik Pratikatmak Swarup (Hindi Edition)
महाभारत’ को पांचवां वेद माना गया है और ग्रंथ की भूमिका में इसे चारों वेदों से भी अधिक गरिमावान घोषित {किया गया है (1.1.272)। ऋषियों ने इसे पुराण और इतिहास दोनों कहा है। (1.1.17,19) {किन्तु कथा के लगभग सभी प्रमुख पात्रों की उत्पत्ति दैविक अथवा परामानवीय बतलाई गई है जिससे इंगित होता है कि कथा को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान {किया गया है। वस्तुत: हमारे प्राचीन वैदिक और पौराणिक साहित्य में मनुष्य के जीवन को ऊँचा उठाने के लिये , उसे आत्मनिष्ठ / सर्वनिष्ठ बनाने के लिए, कथाओं का स्वरूप इसी प्रकार का रचा गया है। इस हेतु ऋषियों ने कथाओं में पात्रों और घटनाओं को इतिहास, भूगोल, खगोल, अर्थशास्त्र, आयुविज्ञान, मनोविज्ञान आदि विभिन्न क्षेत्रों से लेकर उनका रूपान्तरण इस दॄष्टि से किया है कि कथा पाठक को आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ाने में सहायक हो।
Publisher : Punit Advertising Private Limited; 2020th edition (February 17, 2020)
Publication date : February 17, 2020
Language : Hindi
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